हिंदू पंचांग में भाद्रपद माह का शुक्ल पक्ष विशेष महत्व रखता है। इसी माह की चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता, मंगलमूर्ति भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जाता है। यही कारण है कि इस दिन गणेश प्रतिमा को विधि-विधान से “बैठाया” जाता है, यानी गणेश स्थापना कर उत्सव का प्रारंभ होता है। इसे ही गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी कहा जाता है।
गणेश चतुर्थी का पौराणिक आधार
प्राचीन ग्रंथों में वर्णन है कि माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन गंध, चंदन और उबटन से एक बालक की मूर्ति बनाकर उसमें प्राण फूंके थे। यही बालक आगे चलकर गणपति कहलाए। इसीलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश का जन्मदिन माना जाता है। इस दिन प्रतिमा स्थापना का महत्व इसलिए भी है कि भक्तजन गणेशजी का स्वागत कर उनके आशीर्वाद से जीवन की बाधाओं को दूर करना चाहते हैं।
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भाद्रपद चौथ का ज्योतिषीय महत्व
हिंदू धर्मग्रंथों में चतुर्थी तिथि को ‘गणेश प्रिय तिथि’ कहा गया है। गणपति स्वयं चतुर्थी के अधिपति माने जाते हैं। भाद्रपद मास में सूर्य सिंह राशि में और चंद्रमा कन्या राशि में स्थित रहते हैं, जो धार्मिक दृष्टि से विशेष संयोग होता है। इस शुभ योग में गणेश पूजा करने से घर-परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
गणेश स्थापना की परंपरा
गणेश चतुर्थी पर घर-घर और सार्वजनिक पंडालों में गणेश प्रतिमा स्थापित की जाती है। यह परंपरा महाराष्ट्र से लेकर पूरे भारत और विदेशों तक फैल चुकी है। मान्यता है कि इस दिन प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कर 10 दिनों तक गणपति की आराधना करने से बुद्धि, विद्या और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- पहले दिन प्रतिमा को कलश और मंगल ध्वज के साथ बैठाया जाता है।
- भक्त गणपति को 21 दूर्वा, 21 लड्डू और 21 फूल अर्पित करते हैं।
- प्रतिमा स्थापना के समय मंत्रोच्चार और शुद्धाचार का विशेष महत्व होता है।
सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू
गणेश चतुर्थी केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने आज़ादी के आंदोलन के दौरान इस उत्सव को सार्वजनिक रूप दिया था ताकि समाज एकत्र होकर स्वतंत्रता संग्राम में सहभागी बने। आज भी यह पर्व सांस्कृतिक आयोजनों, नाट्य, संगीत और सामूहिक भोज का अवसर बनता है।
क्यों बैठाते हैं गणेश जी को?
- जन्मतिथि का उत्सव: क्योंकि इसी दिन गणेशजी का प्राकट्य हुआ था।
- विघ्नहर्ता का स्वागत: मान्यता है कि प्रतिमा स्थापना से घर-परिवार में सुख-शांति आती है।
- धार्मिक विधान: गणेशजी को चतुर्थी प्रिय है, इसीलिए इस तिथि पर उनकी विशेष पूजा अनिवार्य मानी गई है।
- सामाजिक समरसता: सामूहिक गणेश स्थापना से समाज में एकजुटता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है।
निष्कर्ष
भाद्रपद की चतुर्थी को गणेशजी को बैठाने की परंपरा उनके जन्मोत्सव और धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। यह न केवल एक आध्यात्मिक पर्व है बल्कि सांस्कृतिक उत्सव भी है, जो श्रद्धा, एकता और उत्साह का प्रतीक बनकर पीढ़ियों से समाज को जोड़ रहा है। यही कारण है कि हर वर्ष भाद्रपद के चौथे दिन पूरे उल्लास के साथ गणेश प्रतिमा को बैठाया जाता है और दस दिनों तक उनकी पूजा कर अनंत चतुर्दशी को विसर्जन किया जाता है।