India EU Trade Deal: आखिरकार 18 सालों से चली आ रही कोशिश कामयाब होने जा रही है. भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच आखिरकार मुक्त व्यापार समझौता (FTA) को लेकर समौता हो गया है. इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ की संज्ञा दी जा रही है. इस व्यापार समझौते के लिए भारत और ईयू के बीच 18 सालों यानि 2007 से बातचीत चल रही थी, जो आखिरकार रंग लाई है. वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया कि इस ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लग गई है और इसकी औपचारिक घोषणा मंगलवार हो जाएगी. (India EU Trade Deal)

भारत ईयू के साथ ट्रेड 51 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद
भारत ईयू के साथ ट्रेड सरप्लस वित्त वर्ष 31 तक 51 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच एफटीए पर बातचीत करीब एक दशक पहले शुरू हुई थी, लेकिन दुनिया में बढ़ती व्यापारिक अनिश्चितता को देखते हुए दोनों देशों ने इसे तेजी से आगे बढ़ाया है. एमके ग्लोबल द्वारा रविवार को जारी एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता ईयू के साथ भारत की व्यापारिक स्थिति को काफी मजबूत कर सकता है. इस समझौते से वित्त वर्ष 2031 तक यूरोपीय संघ के साथ भारत का ट्रेड सरप्लस 50 अरब डॉलर से अधिक बढ़ सकता है. इससे भारत के कुल निर्यात में ईयू संघ की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2025 के 17.3 प्रतिशत की तुलना में बढ़कर लगभग 22-23 प्रतिशत हो सकती है, जिससे भारत की निर्यात वृद्धि को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा. (India EU Trade Deal)
डील के EU के लिए क्या मायने?
मौजूदा दौर में ईयू के निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 0.8 प्रतिशत है, फिर भी यह समझौता यूरोप के लिए भी तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है. हाल के वर्षों में भारत के साथ यूरोप के व्यापार संतुलन में तेज बदलाव आया है. वित्त वर्ष 2019 में यूरोपीय संघ का भारत साथ ट्रेड सरप्लस 3 अरब डॉलर था, जो कि वित्त वर्ष 2025 में 15 अरब डॉलर के व्यापार घाटे में बदल गया है. यह समझौता चीन पर अपनी निर्भरता कम करने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने के यूरोप के व्यापक प्रयासों में भी सहायक है.

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भारत के इन उद्योगों को मिलेगा बड़ा बाजार
इस एफटीए से भारत के अधिक श्रम उपयोग वाले कपड़ा और फुटवियर जैसी इंडस्ट्री के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और केमिकल इंडस्ट्री को बड़ा बाजार मिल सकता है. वित्त वर्ष 25 में भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच 136 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. इस दौरान यूरोपीय यूनियन से भारत ने 60.7 अरब डॉलर का आयात किया था, जबकि 75.9 अरब डॉलर का सामान यूरोप में निर्यात किया था. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि यूरोपीय संघ को भारत से होने वाले निर्यात, जिनमें स्मार्टफोन, वस्त्र, जूते, टायर, दवाइयां, ऑटो पार्ट्स, प्रोसेस्ड फ्यूल और हीरे शामिल हैं, मुख्य रूप से उन आयातों की जगह लेते हैं जो यूरोप पहले अन्य देशों से प्राप्त करता था. इनमें से कई विनिर्माण गतिविधियां यूरोपीय कंपनियों द्वारा वर्षों पहले ही दूसरे देशों में स्थानांतरित कर दी गई थीं.
वहीं दूसरी ओर, यूरोपीय संघ से भारत को होने वाले निर्यात में उच्च श्रेणी की मशीनरी, विमान, प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक आइट्म्स, रसायन, लेटेस्ट चिकित्सा उपकरण और मेटल स्क्रैप शामिल हैं. ये उत्पाद भारतीय कारखानों, पुनर्चक्रण इकाइयों और लघु एवं मध्यम उद्यम समूहों को सहयोग प्रदान करते हैं, जिससे उत्पादकता और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होता है. प्रस्तावित समझौते से भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों के उत्पादों पर शुल्क कम होने या समाप्त होने की उम्मीद है, साथ ही यूरोपीय कंपनियों को उच्च श्रेणी की कारों और शराब के लिए भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी. (India EU Trade Deal)

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सस्ती हो जाएगी लग्जरी कारें
यूरोपीय संघ के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) के तहत भारत यूरोपीय गाड़ियों पर आयात शुल्क कम करके 40 प्रतिशत करने की तैयारी कर रहा है, जो कि फिलहाल 110 प्रतिशत तक है. यह जानकारी रिपोर्ट्स में दी गई. रिपोर्ट्स में आगे बताया गया कि एफटीए में 15,000 यूरो (भारतीय रुपयों में करीब 16.3 लाख रुपए) से अधिक की कारों पर यह नया शुल्क लागू होगा. इसको आने वाले वर्षों में 10 प्रतिशत तक किए जाने की संभावना है. हालांकि, इस एफटीए में भी ब्रिटेन से हुए एफटीए की तरह की पूरी तरह से निर्मित गाड़ी भारत में आयात करने की एक सीमा होगी. सूत्रों ने बताया कि भारत ने यूरोप से सालाना 2 लाख ईंधन वाली गाड़ियां आयात करने के लिए सहमत हुआ है. हालांकि, एफटीए सामने आने के बाद इसमें बदलाव संभव है. भारत वर्तमान में अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कार बाजार है, लेकिन यह सबसे अधिक संरक्षित बाजारों में से एक बना हुआ है. भारत में पूरी तरह से निर्मित कारों पर आयात शुल्क 70 प्रतिशत से 110 प्रतिशत तक है, इस नीति की कई वैश्विक ऑटो कंपनियों ने आलोचना भी की है. आयात करों में कमी से यूरोपीय कार निर्माताओं को भारत में अपने आयातित मॉडलों की कीमत अधिक प्रतिस्पर्धी रखने में मदद मिलेगी. (India EU Trade Deal)



