भूख हड़ताल से अधिकार तक: मुरहा नागेश को पुश्तैनी जमीन पर मिला हक, बोया उम्मीद की धान
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है, जो हमारे लोकतंत्र, प्रशासनिक मशीनरी और मीडिया की सामूहिक शक्ति का एक बड़ा उदाहरण बन गई है। यह कहानी है मुरहा नागेश नामक एक आम किसान की, जिसे अपने ही पुश्तैनी जमीन पर अधिकार पाने के लिए भूख हड़ताल से लेकर आत्मदाह की चेतावनी तक का सहारा लेना पड़ा। अंततः मीडिया की जागरूकता और प्रशासन की तत्परता से उसे उसका हक मिला, लेकिन यह सवाल भी छोड़ गया—क्या भारत में आज भी न्याय के लिए भूखा मरना पड़ता है?
संघर्ष की शुरुआत
मुरहा नागेश का परिवार वर्षों से अपनी पुश्तैनी जमीन को लेकर संघर्ष कर रहा था। करीब साढ़े सात एकड़ जमीन पर वर्षों से एक दबंग मोतीलाल यादव का कब्जा था। मुरहा की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रशासनिक प्रक्रिया में लगातार अनदेखी होती रही। न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही थी, लेकिन उम्मीद खत्म नहीं हुई। अंततः 14 जुलाई को मुरहा नागेश अपने परिवार के साथ गरियाबंद कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल पर बैठ गया।
यह हड़ताल सिर्फ जमीन के एक टुकड़े के लिए नहीं थी, बल्कि यह एक गरीब किसान के अस्तित्व की लड़ाई थी। पूरे दिन 12 घंटे की भूख हड़ताल और आत्मदाह की चेतावनी के बाद प्रशासन हरकत में आया।
भूख हड़ताल से अधिकार तक: मुरहा नागेश को पुश्तैनी जमीन पर मिला हक, बोया उम्मीद की धान
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है, जो हमारे लोकतंत्र, प्रशासनिक मशीनरी और मीडिया की सामूहिक शक्ति का एक बड़ा उदाहरण बन गई है। यह कहानी है मुरहा नागेश नामक एक आम किसान की, जिसे अपने ही पुश्तैनी जमीन पर अधिकार पाने के लिए भूख हड़ताल से लेकर आत्मदाह की चेतावनी तक का सहारा लेना पड़ा। अंततः मीडिया की जागरूकता और प्रशासन की तत्परता से उसे उसका हक मिला, लेकिन यह सवाल भी छोड़ गया—क्या भारत में आज भी न्याय के लिए भूखा मरना पड़ता है?
संघर्ष की शुरुआत
मुरहा नागेश का परिवार वर्षों से अपनी पुश्तैनी जमीन को लेकर संघर्ष कर रहा था। करीब साढ़े सात एकड़ जमीन पर वर्षों से एक दबंग मोतीलाल यादव का कब्जा था। मुरहा की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रशासनिक प्रक्रिया में लगातार अनदेखी होती रही। न्याय की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही थी, लेकिन उम्मीद खत्म नहीं हुई। अंततः 14 जुलाई को मुरहा नागेश अपने परिवार के साथ गरियाबंद कलेक्ट्रेट के सामने भूख हड़ताल पर बैठ गया।
यह हड़ताल सिर्फ जमीन के एक टुकड़े के लिए नहीं थी, बल्कि यह एक गरीब किसान के अस्तित्व की लड़ाई थी। पूरे दिन 12 घंटे की भूख हड़ताल और आत्मदाह की चेतावनी के बाद प्रशासन हरकत में आया।
प्रशासन की तत्परता, मीडिया की भूमिका
इस मामले में मीडिया की भूमिका बेहद निर्णायक रही। जैसे ही समाचार चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर नागेश परिवार की खबर प्रमुखता से आई, प्रशासन की नींद टूटी। अगले ही दिन प्रशासनिक टीम जिसमें एसडीएम डॉ. तुलसीदास मरकाम, तहसीलदार, और स्थानीय पुलिस बल शामिल थे, मुरहा नागेश के गांव पहुँची।
वहीं मोके पर जब मुरहा का ट्रैक्टर उस जमीन में बुआई करने पहुंचा, जहां पहले मोतीलाल ने मक्का बो रखा था, तो स्थिति थोड़ी तनावपूर्ण हो गई। मोतीलाल यादव के परिवार की एक महिला ट्रैक्टर के सामने आकर खड़ी हो गई, लेकिन एसडीएम की सूझबूझ और मौके पर पुलिस की संयमित कार्यवाही से स्थिति को नियंत्रित किया गया। प्रशासन ने दो टूक कहा—अब यह जमीन मुरहा की है और उस पर कोई अवैध कब्जा नहीं होगा।
हल चला, उम्मीद की धान बोई
मुरहा नागेश ने खुद अपने हाथों से उस जमीन पर हल चलाया। वर्षों से बेदखल रहने के बाद जब उसने अपनी मिट्टी पर दोबारा खेती शुरू की, तो वह पल सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, वह एक गरीब किसान की अस्मिता और लोकतंत्र में उसकी आस्था की पुनर्स्थापना थी। उसने न केवल हल चलाया, बल्कि उस जमीन पर “उम्मीद की धान” भी बो दी।
प्रशासन का वादा
एसडीएम डॉ. तुलसीदास मरकाम ने न सिर्फ मौके पर मौजूद रहकर मुरहा को जमीन दिलाई, बल्कि यह भी आश्वासन दिया कि पूरे गांव का राजस्व रिकॉर्ड दुरुस्त किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि मुरहा को उसकी जमीन का कागजी हक—पटवारी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेज भी जल्द ही सौंपे जाएंगे, ताकि भविष्य में फिर कोई अड़चन न आए।
मीडिया को धन्यवाद
मुरहा नागेश और उसके परिवार ने मीडिया का आभार जताते हुए कहा कि अगर पत्रकारों ने उनकी आवाज़ को उठाया नहीं होता, तो शायद प्रशासन अब भी खामोश रहता। लोकतंत्र की इस लड़ाई में मीडिया सचमुच “लोक” की आवाज़ बनकर सामने आया। कई स्थानीय पत्रकार, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, न्यूज़ पोर्टल और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने लगातार इस मुद्दे को उठाकर जनमत का दबाव बनाया, जिसके कारण व्यवस्था को झुकना पड़ा।
जनप्रतिनिधियों की भूमिका
घटना के समय गांव के सरपंच समेत कई स्थानीय जनप्रतिनिधि मौके पर उपस्थित रहे और मुरहा नागेश के पक्ष में खड़े दिखाई दिए। यह राजनीतिक प्रतिनिधियों के लिए भी एक अवसर था कि वे आम जनता के हक में बोलें और उन्हें समर्थन दें।
सरकार से बड़ा सवाल
इस घटना ने एक बड़ा सवाल देश और राज्य सरकार के सामने खड़ा कर दिया है—क्या आम नागरिक को अपने अधिकारों के लिए भूख हड़ताल, आत्मदाह की चेतावनी और मीडिया का सहारा लेना अनिवार्य हो गया है? क्या प्रशासन तब ही हरकत में आता है जब मामला वायरल हो जाए या आंदोलन हो?
यह कोई अकेला मामला नहीं है। देश के कोने-कोने में कई मुरहा नागेश होंगे, जो न्याय की उम्मीद में सालों तक संघर्ष करते रहते हैं। अगर मीडिया न हो, अगर प्रशासन सजग न हो, तो उनकी आवाज़ कौन सुनेगा? यह घटना व्यवस्था को आईना दिखाती है कि न्याय का पहिया आम आदमी के लिए कितना धीमा चलता है।
निष्कर्ष: अधिकार की जीत, लेकिन व्यवस्था पर सवाल बरकरार
मुरहा नागेश को उसका हक मिल गया। उसने न केवल अपनी जमीन पर कब्जा पाया, बल्कि उसके साथ जुड़ी आत्मा और पहचान को भी वापस पाया। परंतु यह जीत उतनी सहज नहीं थी, जितनी होनी चाहिए थी। लोकतंत्र में यदि किसी नागरिक को अपने अधिकार के लिए भूखा रहना पड़े, आत्मदाह की धमकी देनी पड़े, तब जाकर सरकार और प्रशासन जागें—तो यह किसी भी संवेदनशील व्यवस्था की असफलता का संकेत है।
अंतिम पंक्तियाँ
मुरहा नागेश की कहानी सिर्फ उसकी नहीं है, यह हर उस इंसान की कहानी है जो अन्याय के खिलाफ डटा रहा। यह घटना बताती है कि जब आम जनता, मीडिया और कुछ ईमानदार अफसर मिलकर खड़े होते हैं, तो पत्थर भी पिघलते हैं। पर ज़रूरत है कि ऐसी सजगता सिस्टम का हिस्सा बने, मजबूरी नहीं।