गरियाबंद। रविवार की सुबह छुरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत मुडीपानी के कमारपारा में ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसने पूरे गांव को दहला दिया। रोज़ की तरह सुबह टहलने और शौच के लिए घर से निकले 48 वर्षीय धनेश कमार पिता मंगल कमार पर अचानक एक जंगली भालू टूट पड़ा। घटना मलेवाडोंगर की तलहटी में हुई, जहां धनेश का सामना अचानक भालू से हो गया। देखते ही देखते शांत माहौल चीख-पुकार और अफरा-तफरी में बदल गया।
भालू के अचानक हुए हमले से ग्रामीण सकते में
गांववालों के अनुसार धनेश अपने घर से करीब आधा किलोमीटर दूर जंगल किनारे निकले थे। तभी झाड़ियों से निकले भालू ने उन पर हमला बोल दिया। भालू ने न केवल धनेश को गिराकर पंजों और दांतों से लगातार वार किए, बल्कि उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया। धनेश पूरी तरह से लहूलुहान हो गए और उनके शरीर पर गहरे घाव आ गए।
धनेश की दर्दनाक चीख सुनकर आसपास काम कर रहे ग्रामीण मौके पर दौड़े। उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए डंडे और पत्थरों से भालू को खदेड़ने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद ग्रामीण भालू को भगाने में सफल हुए और घायल धनेश को किसी तरह उठाकर गांव तक लाए।
अस्पताल में भर्ती, हालत गंभीर
परिजनों और ग्रामीणों ने धनेश को प्राथमिक इलाज दिलाने के बाद तत्काल जिला अस्पताल भेजा। डॉक्टरों के अनुसार उनके शरीर पर कई जगह गहरे घाव हैं और अधिक खून बह जाने से हालत नाजुक बनी हुई है। फिलहाल धनेश को चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया है।
गांव में फैली दहशत
इस घटना के बाद पूरे मुडीपानी और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से क्षेत्र के जंगलों में जंगली जानवरों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है। खेतों और जंगल किनारे बसे गांवों के लोग खासतौर पर खतरे में हैं। महिलाएं और बच्चे अब अकेले बाहर निकलने से डर रहे हैं।
गांव की महिला अनीता बाई बताती हैं –
“अब तो दिन के समय भी बाहर निकलने से डर लग रहा है। बच्चे खेल-कूद के लिए भी बाहर नहीं जाते। हर समय यह डर बना रहता है कि कहीं अचानक भालू या अन्य जानवर सामने न आ जाएं।”
वन विभाग की लापरवाही पर उठे सवाल घटना की सूचना तुरंत
गरियाबंद जिले के सुबह छुरा ब्लॉक के ग्राम पंचायत मुडीपानी के कमारपारा में ऐसा मंजर देखने को मिला, जिसने पूरे गांव को दहला दिया। रोज़ की तरह सुबह टहलने और शौच के लिए घर से निकले 48 वर्षीय धनेश कमार पिता मंगल कमार पर अचानक एक जंगली भालू टूट पड़ा। घटना मलेवाडोंगर की तलहटी में हुई, जहां धनेश का सामना अचानक भालू से हो गया। देखते ही देखते शांत माहौल चीख-पुकार और अफरा-तफरी में बदल गया।
भालू के अचानक हुए हमले से ग्रामीण सकते में
गांववालों के अनुसार धनेश अपने घर से करीब आधा किलोमीटर दूर जंगल किनारे निकले थे। तभी झाड़ियों से निकले भालू ने उन पर हमला बोल दिया। भालू ने न केवल धनेश को गिराकर पंजों और दांतों से लगातार वार किए, बल्कि उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया। धनेश पूरी तरह से लहूलुहान हो गए और उनके शरीर पर गहरे घाव आ गए।
धनेश की दर्दनाक चीख सुनकर आसपास काम कर रहे ग्रामीण मौके पर दौड़े। उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए डंडे और पत्थरों से भालू को खदेड़ने की कोशिश की। काफी मशक्कत के बाद ग्रामीण भालू को भगाने में सफल हुए और घायल धनेश को किसी तरह उठाकर गांव तक लाए।
अस्पताल में भर्ती, हालत गंभीर
परिजनों और ग्रामीणों ने धनेश को प्राथमिक इलाज दिलाने के बाद तत्काल जिला अस्पताल भेजा। डॉक्टरों के अनुसार उनके शरीर पर कई जगह गहरे घाव हैं और अधिक खून बह जाने से हालत नाजुक बनी हुई है। फिलहाल धनेश को चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया है।
गांव में फैली दहशत
इस घटना के बाद पूरे मुडीपानी और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से क्षेत्र के जंगलों में जंगली जानवरों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है। खेतों और जंगल किनारे बसे गांवों के लोग खासतौर पर खतरे में हैं। महिलाएं और बच्चे अब अकेले बाहर निकलने से डर रहे हैं।
गांव की महिला अनीता बाई बताती हैं –
“अब तो दिन के समय भी बाहर निकलने से डर लग रहा है। बच्चे खेल-कूद के लिए भी बाहर नहीं जाते। हर समय यह डर बना रहता है कि कहीं अचानक भालू या अन्य जानवर सामने न आ जाएं।”
वन विभाग की लापरवाही पर उठे सवाल
घटना की सूचना तुरंत परसुली वन परिक्षेत्र के अधिकारियों को दी गई। लेकिन ग्रामीणों ने वन विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि विभागीय गश्त केवल कागजों पर होती है। असल में ग्रामीणों को जंगली जानवरों से खुद ही अपनी जान बचानी पड़ रही है।
गांव के सरपंच प्रतिनिधि रमेश कश्यप ने कहा –
“हम कई बार वन विभाग से गश्त बढ़ाने और सुरक्षा उपाय करने की मांग कर चुके हैं, लेकिन केवल आश्वासन मिलता है। जब तक किसी पर हमला नहीं होता, तब तक विभाग हरकत में नहीं आता।”
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
इस हादसे के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग और प्रशासन से तुरंत ठोस कदम उठाने की मांग की है। उनकी मुख्य मांगें इस प्रकार हैं –
- इलाके में नियमित रूप से वन विभाग की गश्त हो।
- रात के समय अतिरिक्त चौकसी और निगरानी की व्यवस्था की जाए।
- जरुरत पड़ने पर ट्रैंक्विलाइज़र टीम तैनात की जाए, ताकि आक्रामक भालुओं को काबू किया जा सके।
- ग्रामीण इलाकों के पास जंगली जानवरों की आवाजाही पर नजर रखने के लिए कैमरा ट्रैप लगाए जाएं।
- गांवों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को जंगल में सुरक्षित तरीके से आने-जाने की जानकारी दी जाए।
लगातार बढ़ते वन्यजीव-मानव संघर्ष
विशेषज्ञ बताते हैं कि वन्यजीव-मानव संघर्ष अब केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। गांव, खेत और यहां तक कि शहरों के बाहरी इलाके भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। दरअसल, जंगलों में भोजन और पानी की कमी होने से भालू, हाथी और तेंदुए जैसे जंगली जानवर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अशोक साहू के अनुसार –
“गरियाबंद और आसपास के इलाकों में पिछले कुछ वर्षों में भालू के हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। इसका कारण यह है कि जंगलों के भीतर उनके प्राकृतिक आवास में लगातार कमी आ रही है। फसल कटाई के मौसम में भालू और हाथियों की गतिविधियां और बढ़ जाती हैं।”
पिछले घटनाओं पर नजर
यह पहली बार नहीं है जब इलाके में भालू ने हमला किया हो। पिछले दो वर्षों में गरियाबंद जिले में आधा दर्जन से अधिक बार भालुओं के हमले सामने आ चुके हैं। कई मामलों में लोग गंभीर रूप से घायल हुए और कुछ ने अपनी जान भी गंवाई।
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इसी साल गर्मियों में फिंगेश्वर इलाके में भी भालू ने खेत में काम कर रहे दो किसानों को घायल कर दिया था। उसके बाद से ही ग्रामीण लगातार सुरक्षा की मांग कर रहे हैं।
वन विभाग का दावा
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें सूचना मिलते ही टीम को मौके पर रवाना किया गया है। परसुली रेंज अधिकारी ने बताया कि घायल व्यक्ति के इलाज का पूरा खर्च विभाग उठाएगा। साथ ही, ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए गश्त बढ़ाने और ट्रैंक्विलाइज़र टीम को अलर्ट पर रखने की व्यवस्था की जा रही है।
अधिकारियों के मुताबिक विभाग की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि इंसान और जंगली जानवर आमने-सामने न आएं। इसके लिए वन क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाई जाएगी।
प्रशासन की चुनौती
ग्रामीणों का गुस्सा और डर दोनों ही प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। एक ओर ग्रामीण सुरक्षा की मांग कर रहे हैं, तो दूसरी ओर जंगली जानवरों को उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रखना भी जरूरी है। वन्यजीव संरक्षण और ग्रामीणों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है।
निष्कर्ष
मुडीपानी के कमारपारा में हुई यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या ग्रामीण सुरक्षित हैं? क्या वन विभाग समय रहते ऐसे हालात को रोकने में सक्षम है? धनेश कमार के घायल होने के बाद गांव में छाई दहशत और लोगों की मांगें इस बात का संकेत हैं कि अब प्रशासन और वन विभाग को ठोस कदम उठाने होंगे।
यदि समय रहते उपाय नहीं किए गए तो भालू और अन्य जंगली जानवरों के हमले भविष्य में और गंभीर रूप ले सकते हैं।