
गरियाबंद। जिला मुख्यालय से लगभग 11 किलोमीटर दूरी से लगे ग्राम पंचायत जोबा के आश्रित ग्राम बोहारडीही के विशेष पिछड़ी कमार जनजाति के बुजुर्ग सुनाराम कमार जिस की स्थिति चलने की नहीं है, वे जमीन घसीटते हुए चलते हैं। आज तक शासन-प्रशासन इनके पास नहीं पहुंचे हैं। शासन-प्रशासन की गई महत्वपूर्ण योजनाएं राज्य व जिले में संचालित है। लेकिन इस बुजुर्ग को अभी तक इसकी जानकारी नहीं, क्योंकि इन तक कोई भी सरकारी अमला इनके पास दस्तक नहीं दी हैं। बुजुर्ग लोगों की स्वास्थ्य संबंधित विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए बुजुर्गों के लिए अनेकों योजनाएं संचालित है लेकिन इसका लाभ सुनाराम कमार के नसीब में नहीं हैं लगता है। वे अपने घर में अपने 12 वर्षीय नाबालिक पोते (संतन कमार )के साथ अंधेरा घर में रहता है । संतन कमार के माता-पिता नहीं है, इस कारण वे दोनो परिवार रहते हैं।
छत्तीसगढ़ राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली पेंशन भी प्राप्त नहीं हो रहा है। शासन प्रशासन ने बुजुर्गों के लिए कई योजनाएं तथा नीतियां शुरू की है लेकिन सिर्फ कागजों पर।
भारत देश में 6 से 14 वर्ष के हर बच्चे को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना है। सरकार की शिक्षा का अधिकार से वंचित विशेष पिछड़ी कमार जनजाति के गरीब बेटा संतन कमार।
संविधान (86 संशोधन) अधिनियम शिक्षक के अधिकार के माध्यम से एक मौलिक अधिकार के रूप में पहचाना जाता है। इस अधिकार के अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चे को मुक्ता और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है।
गरियाबंद जिले के समाजसेवी मनोज पटेल ने बताया कि शिक्षा बच्चों का जन्म सिद्ध अधिकार है, और इस देश के हर बच्चे को हैं। बच्चे किसी भी राष्ट्र के सर्वोच्च संपत्ति है। वे संभावित मानव संसाधन हैं। शिक्षा एक आदमी के जीवन में महत्वपूर्ण है। आज शिक्षा संदेह के एक कण के बिना अधूरा है, और एक आदमी के अकार शून्य व अंधकार में है, शिक्षा के बिना। किसी के जीवन और शैली को बदलने के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है। वहा पहुंचे समाजसेवी मनोज पटेल व रेखराम ध्रुव ने ऐसे गरीब परिवारों की मदद करने अपील किया।



